Saturday, 19 June 2021

It's all about the method to be imensipated from mere luxury to achieve iternal life. Page no - 302 Srimad Bagabatam.

आध्यात्मिक जगत, जो भगवान् की तीन चौथाई शक्ति से बना है, इस भौतिक जगत से परे स्थित है और यह उन लोगों के निमित्त है, जिनका पुनर्जन्म नहीं होता। अन्य लोग, जो गृहस्थ जीवन के प्रति आसक्त हैं और ब्रह्मचर्य व्रत का कठोरता से पालन नहीं करते, उन्हें तीन लोकों के अन्तर्गत ही रहना होता है।
सबसे अच्छी बात यह होगी कि ज्योंही मनुष्य योनि प्राप्त हो, त्योंही अमरता की चरम सिद्धि प्राप्त कर ली जाय, अन्यथा मनुष्य जीवन की सारी नीतिकुशलता असफल हो जायेगी । भगवान् चैतन्य अपने अनुयायियों को ब्रह्मचर्य पालन करने की शिक्षा देने में अत्यन्त कट्टर थे। उन्होंने अपने एक निजी सेवक छोटे हरिदास को ब्रह्मचर्य व्रत पालन न कर सकने के लिए कठोर सजा दी थी। अतएव जो अध्यात्मवादी भौतिक दुखों से परे के लोक में जाने का इच्छुक हो, उसके लिए जान-बूझकर विषयी जीवन में लिप्त होना आत्मघात से भी अधिक होगा और संन्यासी के लिए तो विशेष रूप से । संन्यास आश्रम में विषयी जीवन धार्मिक जीवन का सर्वाधिक विकृत रूप है और ऐसे पथभ्रष्ट व्यक्ति की रक्षा तभी हो सकती है, जब भाग्यवश उसकी भेंट किसी शुद्ध भक्त से हो सके।

No comments:

Post a Comment